ऐसे भी कुछ बेनाम-बेदख़ल से हैं
बदकिस्मत से गिराये नज़र से हैं,
वो काटते हैं ये उग जाते हैं फिर से
न जाने किस मौसम की फसल से हैं?
ऐसे भी कुछ बेनाम-बेदख़ल से हैं।
दबाये गये ये सताए गये ये
मगर हार अपनी न मानीेेे कभी,
कभी आतताई की भी लात खाई
उन्हीं दुश्मनों को परोसी मिठाई,
लगाया गले से सभी उलझनों को
जो सुलझी तो तस्वीर थी साफ़ पाई…
जो सुलझी तो तस्वीर थी साफ़ पाई
वो समझे हमें- 'ये बड़े बेअसर-से हैं'
ना-समझ हैं, बदगुमाँ हैं, बे-अक्ल से हैं
ऐसे भी कुछ बेनाम...
