अब तुम्हें सोचूँ कभी तो याद कुछ आये नहीं
आये भी तो किस तरह हमने सिले पाये नहीं,
कुछ गिले हम हाँ मगर तुमको नज़र कर आये थे
चाहतों में जो दिए हमने वही बस पाये थे,
इस तरह के जैसे हाथों से फिसलती रेत है
उनको मैंने खो दिया जो कल मेरे हमसाये थे।
अब कभी सोचूँ तुम्हें तो इल्म बस होता है ये...
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