Thursday, May 2, 2013

Aik Sawaali


बहुत दिनों से जाग रहा था एक सवाली सरहद पे
ठंडी मिट्टी ताप रहा था एक सवाली सरहद पे,

मेरी बीवी, मेरे बच्चे, मेरा चौखट तन्हा होंगे
सूने रस्ते कच्चे-पक्के तकते मेरा रास्ता होंगे,
मेरे सपने, मेरे अपने, मुल्क भी मेरा रुसवा होंगे
एक बार मिलने ना आया, ऐसा करते शिकवा होंगे..
एक बार मिलने ना आया, ऐसा करते शिकवा होंगे

बहुत दिनों से मांग रहा था भीख रिहाई सरहद पे
ठंडी मिट्टी ताप रहा था एक सवाली सरहद पे। 

पिछले मास जो लोहड़ी बीती, क्या बतलाऊँ कैसी बीती
मुझको मेरे घर जाना है, मैंने बड़ी गुज़ारिश की थी।
गाँव में मेरे खेत है छोटा, उसकी फसल पकी तो होगी
मुट्ठी भर गुड़ चना रेवड़ी मेरे घर भी बँटी तो होगी।
तू बतलाये ना बतलाये मुझको पता है सब सुखप्रीतो
पिछले २२ साल की रातें तेरी रो-रो कटी तो होंगी... 
पिछले २२ साल की रातें तेरी रो-रो कटी तो होंगी।

यादों में वो झाँक रहा था एक सवाली सरहद पे
अपनी चिट्ठी बाँच रहा था एक सवाली सरहद पे। 
बहुत दिनों से जाग  था एक सवाली सरहद पे...

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