Wednesday, December 18, 2013

अश्क़ों से पलकें

अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये,
ख़ुद अपने हाथों से छीनीं थी खुशियाँ
ख़ुद अपने हाथों से आँसू थे बोए।

अश्क़ों से पलकें सजा के सोये,
हम तेरी यादें भुला के रोये।

कलम ने मेरी जब कभी कुछ लिखा तो...
मिसरों में मेरे तेरा ज़िक्र निकला।
चाहा तुझे दिल ने आशिक़-सा होके..
दिल ये बोहोत साला बेफ़िक्र निकला। 
सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल लगा के नतीजा क्या निकला??

सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल जला के नतीजा क्या निकला??

ग़म को बहाते गए आँसुवों में,
महफ़िल में सब को रुला के रोये...
अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये।

Saturday, December 7, 2013

यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी

यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई
बचपन के गलियारे जैसे खेले थे हम चोर-सिपाही।
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई...

हाथों से आँखों को ढकना, उलटे दस तक गिनती गिनना,
मैं ढूँढुंगा पहले तुमको, देर तलक पर तुम ना छिपना।
पीपल, बरगद, गुलमोहर से सावन के वो मौसम लाई....
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।

पिछले चंद महीनों से यादों का आना हुआ नहीं तो
यूँ ही इक दिन यादों के आँगन में मन भी पोहोंच गया।
यादों को ढूँढा हमने यादों का पीछा बोहोत किया,
नाम-पता भी खोजा तेरा, हमने कितना जतन किया।
कोई मिला नहीं हमको जो तेरा निशां दिखा जाता
होके तुम अनजान से कैसे मन में आये बतलाता।
बचपन के वो खेले सारे, रेले-पेले-मेले सारे
उन सब मैं तुम साथ थी मेरे, पर तेरी पहचान नहीं,
यादें हैं, यादों में तुम, हो कौन मगर ये पता नहीं।

कैसी उलझन दे डाली ये तूने मुझको हरजाई???
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।

Wednesday, December 4, 2013

मैं एक वक़्त का क़तरा था

मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया,
पल भर को हंसाया ख़ूब मगर....जो बीता तो सब रीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
शिक़वों का कोई हिसाब नहीं दुनिया ने शिक़ायत कहीं बोहोत,
किस-किस को मनाता किस को नहीं लाचार था मैं मजबूर बोहोत।
मैं हालातों की कठपुतली, कठपुतली मैं जज़्बातों की,
जीते-जी हारा खेल बोहोत, जाँ हारा तो सब जीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।