यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई
बचपन के गलियारे जैसे खेले थे हम चोर-सिपाही।
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई...
हाथों से आँखों को ढकना, उलटे दस तक गिनती गिनना,
मैं ढूँढुंगा पहले तुमको, देर तलक पर तुम ना छिपना।
पीपल, बरगद, गुलमोहर से सावन के वो मौसम लाई....
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।
पिछले चंद महीनों से यादों का आना हुआ नहीं तो
यूँ ही इक दिन यादों के आँगन में मन भी पोहोंच गया।
यादों को ढूँढा हमने यादों का पीछा बोहोत किया,
नाम-पता भी खोजा तेरा, हमने कितना जतन किया।
कोई मिला नहीं हमको जो तेरा निशां दिखा जाता
होके तुम अनजान से कैसे मन में आये बतलाता।
बचपन के वो खेले सारे, रेले-पेले-मेले सारे
उन सब मैं तुम साथ थी मेरे, पर तेरी पहचान नहीं,
यादें हैं, यादों में तुम, हो कौन मगर ये पता नहीं।
कैसी उलझन दे डाली ये तूने मुझको हरजाई???
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।
बचपन के गलियारे जैसे खेले थे हम चोर-सिपाही।
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई...
हाथों से आँखों को ढकना, उलटे दस तक गिनती गिनना,
मैं ढूँढुंगा पहले तुमको, देर तलक पर तुम ना छिपना।
पीपल, बरगद, गुलमोहर से सावन के वो मौसम लाई....
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।
पिछले चंद महीनों से यादों का आना हुआ नहीं तो
यूँ ही इक दिन यादों के आँगन में मन भी पोहोंच गया।
यादों को ढूँढा हमने यादों का पीछा बोहोत किया,
नाम-पता भी खोजा तेरा, हमने कितना जतन किया।
कोई मिला नहीं हमको जो तेरा निशां दिखा जाता
होके तुम अनजान से कैसे मन में आये बतलाता।
बचपन के वो खेले सारे, रेले-पेले-मेले सारे
उन सब मैं तुम साथ थी मेरे, पर तेरी पहचान नहीं,
यादें हैं, यादों में तुम, हो कौन मगर ये पता नहीं।
कैसी उलझन दे डाली ये तूने मुझको हरजाई???
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।

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