मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया,
पल भर को हंसाया ख़ूब मगर....जो बीता तो सब रीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
शिक़वों का कोई हिसाब नहीं दुनिया ने शिक़ायत कहीं बोहोत,
किस-किस को मनाता किस को नहीं लाचार था मैं मजबूर बोहोत।
मैं हालातों की कठपुतली, कठपुतली मैं जज़्बातों की,
जीते-जी हारा खेल बोहोत, जाँ हारा तो सब जीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
पल भर को हंसाया ख़ूब मगर....जो बीता तो सब रीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
शिक़वों का कोई हिसाब नहीं दुनिया ने शिक़ायत कहीं बोहोत,
किस-किस को मनाता किस को नहीं लाचार था मैं मजबूर बोहोत।
मैं हालातों की कठपुतली, कठपुतली मैं जज़्बातों की,
जीते-जी हारा खेल बोहोत, जाँ हारा तो सब जीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
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