Monday, June 30, 2014

एक वक्त हुआ करता था


एक वक्त हुआ करता था, इक दौर हुआ करता था
ज़िन्दा होने का मतलब कुछ और हुआ करता था।
तुमको देखा करते थे, साँसें महसूस थे करते
और अब तनहाई तेरी ये जान मेरी लेती है।
एक लफ़्ज़ हुआ करता था, होठों से निकल कर तेरे
दुनिया ने जाना मुझको, मेरा नाम हुआ करता था।
एक वक्त हुआ करता था, इक दौर हुआ करता था
ज़िन्दा होने का मतलब कुछ और हुआ करता था। ।

Thursday, April 24, 2014

ऐसे भी कुछ बेनाम-बेदख़ल से हैं

ऐसे भी कुछ बेनाम-बेदख़ल से हैं
बदकिस्मत से गिराये नज़र से हैं,
वो काटते हैं ये उग जाते हैं फिर से
न जाने किस मौसम की फसल से हैं?

ऐसे भी कुछ बेनाम-बेदख़ल से हैं।

दबाये गये ये सताए गये ये 
मगर हार अपनी न मानीेेे कभी,
कभी आतताई की भी लात खाई
उन्हीं दुश्मनों को परोसी मिठाई,
लगाया गले से सभी उलझनों को
जो सुलझी तो तस्वीर थी साफ़ पाई…
जो सुलझी तो तस्वीर थी साफ़ पाई

वो समझे हमें- 'ये बड़े बेअसर-से हैं'
ना-समझ हैं, बदगुमाँ हैं, बे-अक्ल से हैं

ऐसे भी कुछ बेनाम...

Tuesday, April 22, 2014

मन मिर्ज़ा तन साहिबा


मन मिर्ज़ा तन साहिबा
ना था पता हो जाएगा…
मन मिर्ज़ा तन साहिबा, ना था पता हो जाएगा…
इश्क़ सुकूँ देता है सबको…
इश्क़ सुकूँ देता सबको ये मुवा मुझे तड़पाएगा।
मन मिर्ज़ा तन साहिबा
ना था पता हो जाएगा…

तेरी गली-चौबारे-चौखट 
मिलने तुझसे आई थी…
तेरी गली-चौबारे-चौखट मिलने तुझसे आई थी…
मुझको मिर्ज़ा से मिलवा दो झोली भी फैलाई थी,
सारी सदाएँ मेरी ज़ाया सारी दुवाएँ मेरी ज़ाया 
ज़ख्मी दिल ले कर के आई ज़ख़्मी-ज़ख़्मी रूह की काया,
ज़ख्मी दिल ले कर के आई
ज़ख़्मी-ज़ख़्मी रूह की काया…

तू जो मुझे मिल जाए मिर्ज़ा…
तू जो मुझे मिल जाए माहि दिल को मरहम मिल जाएगा…
मन मिर्ज़ा तन साहिबा…

मन मिर्ज़ा तन साहिबा
ना था पता हो जाएगा…
मन मिर्ज़ा तन साहिबा, ना था पता हो जाएगा…
इश्क़ सुकूँ देता है सबको…
इश्क़ सुकूँ देता सबको ये मुवा मुझे तड़पाएगा।
मन मिर्ज़ा तन साहिबा।

Wednesday, April 9, 2014

हमसाये

अब तुम्हें सोचूँ कभी तो याद कुछ आये नहीं
आये भी तो किस तरह हमने सिले पाये नहीं,
कुछ गिले हम हाँ मगर तुमको नज़र कर आये थे
चाहतों में जो दिए हमने वही बस पाये थे,
इस तरह  के जैसे हाथों से फिसलती रेत है
उनको मैंने खो दिया जो कल मेरे हमसाये थे।
अब कभी सोचूँ  तुम्हें तो इल्म बस होता है ये...

Monday, March 31, 2014

मेरी कलम


परेशान-सी है आज ये कलम मेरी
उलझनों में  फँसी आज है कलम मेरी
सौ लफ्ज़ समेटे नोक पे....
चुपचाप-सी है आज कलम मेरी 
कलम बेबस-सी है पर अब ख़ुश रहना  है
बहुत हो चुकी ख़ामोशी अब कुछ कहना चाहती है।


Monday, January 27, 2014

बस तेरी ही थी कमी


चाँदनी की आँच में बादल बनाया रात में,
बस तेरी ही थी कमी चाहत की इस सौगात में।
कुछ थके से थे उनीन्दे तारे सारे जाग कर
देख के सूरत तेरी उन को सुलाया साथ में।

चाँदनी की आँच में बादल बनाया रात में।

मैं पिघलता ही रहा संग रात भी ढलती रही
पर तमन्ना तेरी सीने में युँ ही पलती रही।
अल-सुबह तक बस निहारा और सराहा बस तुझे,
उफ़ अदा तेरी क़यामत कर गई क़ायल मुझे.....
उफ़ अदा तेरा क़यामत कर गई क़ायल मुझे।

अपने इस जज़्बात में, तुझको जिया हर साँस में,
बस तेरी ही थी कमी चाहत की इस सौगात में।

चाँदनी की आँच में बादल बनाया रात में ,
बस तेरी ही थी कमी चाहत की इस सौगात में