Monday, April 8, 2013

अल्फ़ाज़ #1



एक सदी से ज्यादा लम्बा 
एक घड़ी से कम वो लम्हा,
एक शहर यादों का तेरी 
बसा-बसाया तबाह हुआ। 

कहने को कह डाली हमने
जो ना बात बतानी थी,
एक वो दिल में छुपी रह गई
बात जो कहने वाली थी,

सुर्ख़ लहू के जैसा गहरा
कभी हुआ पानी जैसा,
जिस से जा के मिला कभी तो
घुला वो क़तरा वही हुआ। 

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