Saturday, December 29, 2012

फ़ितरत

परिंदे की फ़ितरत थी ज़ख़्मों को लेना
परिंदे की किस्मत थी हर घाव सहना
वो हर बार हर चोट खा के था आता
मैं हर बार बगिया में उसको था पता
मैं मरहम लगाता फिर उसको सहलाता
वो कुछ दिन ठहर के फुर्र से उड़ जाता।
कल शाम भी आया था ज़ख़्मी होके..
बोला मिले उम्रभर मुझको धोखे..
फिर सो गया अपने गम में वो खो के..
फिर सो गया अपने गम में वो खो के।
सुबह जो जागा तो मैने ना पाया उसे वो तो फिर से कहीं उड़ चला था,
शायद दिखा होगा सपना नया सा..
गया था वो धुंधली सी आँखों से रो के..
मिले जो तुम्हे तो उड़ाना नही
खुशियाँ जहाँ की उसे सौंप देना..
परिंदे की फ़ितरत थी ज़ख़्मों को लेना
परिंदे की किस्मत थी हर घाव सहना।

Thursday, December 27, 2012

तुम उदासी ये बता दो


"तुम उदासी..हो ज़रा सी..आज खुश क्यूँ..
ये बता दो।
रूखी पलकों..में नमीं सी..क्यूँ है बाक़ी
ये बता दो।
ये ख़ुशी के मोती समझूँ...
या के ग़म के छींटे??
दोनों ही एहसास दिल में, जाने जिस पे बीते।
तुम कहानी .. हो ज़रा-सी.. क्यूँ पुरानी..
ये बता दो।
बार जितनी..हूँ मैं पढ़ता...
लगती ताज़ी क्यूँ, बता दो।
तुम उदासी..हो ज़रा सी..आज खुश क्यूँ..
ये बता दो।"

शायद


"बिन बताये मैं चला गया तेरी नज़रों से दूर इस तरह शायद...
तुम कभी भुला भी ना पाओगी इस बात को शायद,
बद्दुवाएं निकलीं होंगी दिल से, कोसा भी होगा महीनों तक...
दिल कहता है मगर तुम अब भी मेरे इंतज़ार में होगी शायद।"

Tuesday, December 18, 2012

सपना तेरा


"कौन लिखता है नींदों में सपना तेरा...
सपना तेरा,
बंद आँखों को नज़र चेहरा तेरा...
चेहरा तेरा।

क्या सुबह क्या सहर, क्या घड़ी क्या पहर,
दिल-जिगर हर पहर..पहरा तेरा...
पहरा तेरा!!
बंद आँखों को नज़र चेहरा तेरा...
चेहरा तेरा,
कौन लिखता है नींदों में सपना तेरा??
सपना तेरा।

तुम ख़ूब हो ख़ूबी तुम्हारी सादगी में ख़ूब है..
तुम हुस्न हो उस हुस्न का जो ख़ुद तुझही में  चूर है,
मय भी हो तुम प्याला भी तुम...
पी कर खुदही मदहोश तुम...
आँखों से चख ली थी अभी
संभला नहीं है होश गुम...
आँखों से चख ली थी अभी...संभला नहीं है होश गुम।

है असर गहरा तेरा..है असर गहरा तेरा।
बंद आँखों को नज़र चेहरा तेरा..
चेहरा तेरा।
कौन लिखता है नींदों में सपना तेरा..
सपना तेरा।"
-मयंक

Sunday, December 16, 2012

माँ

आ माँ मुझको सुला दे फिर से तेरे लाल बिछौने में
बीता मेरा सार  बचपन जिस अंगने के कोने में,
आ माँ मुझको सुला दे फिर से तेरे लाल बिछौने में।

जिस पलने में टिमटिमाती अंखियों से तुझे तकता था
तेरे ही आँचल में थी निंदिया, तेरी ही गोद में जगाता था,
तेरी ही गोद में जगाता था.............

अब जब वो सब याद करूँ दिल लगता है बस रोने में
कैसी पीड़ा सहता है कोई अपनी माँ को खोने में.......
अपनी माँ को खोने में।

आ माँ मुझको सुला दे फिर से तेरे लाल बिछौने में।
-मयंक

Saturday, December 15, 2012

ये ज़िन्दगी

"ज़िन्दगी इक सोच है
मौत तो हर रोज़ है,
जिस घड़ी जिस वक़्त रुक जाएगी तेरी सोच भी
जी उठेगी ठीक उस लम्हे में तेरी मौत भी।
इक परेशानी को रहने दे तू अपने रोज़ में
कुछ खुराफातें ज़रूरी हैं बेहेकते होश में।
ये सफ़र जो है अज़ल से आज तक चलता रहा
उसको तू आगे बढ़ा, सोच में अपनी बसा।"
-मयंक

ये शक़

"कुछ दिन से उन पे यूँ शक़ हो रहा है,
ताज्जुब कि ये अचानक हो रहा है।
और प्यार भी आ रहा है वहीँ पे,
दिल ये जहां पे यकीं खो रहा है।
कुछ दिन से उन पे यूँ शक़ हो रहा है।

वो हैं बे-वफ़ा नाम की है वफ़ाई
दिल से खेले बोहोत हैं वो पक्के खिलाड़ी,
हैं दर्द देते परखने को शायद
वो खुश रहें है ये दिल की क़वायद।

हमसे तकाज़ा ये अब हो रहा है
रह-रह के हम पर सितम हो रहा है,
कुछ दिन से उन पे यूँ शक़ हो रहा है,
ताज्जुब कि ये अचानक हो रहा है।"
-मयंक

Thursday, December 13, 2012

जज़्बात

किसी से गिला ही क्या....वो अपना हो या पराया
इंसान गुलाम है जज़्बातों का......
जज्बातों ने हँसाया-रुलाया, जिताया-हराया।
-मयंक

Monday, December 10, 2012

अरमानों के स्वेटर


"कह दिए कुछ सुन लिए
कुछ ख्वाब यूँ ही चुन लिए,
सर्द सी साँसें तुम्हारी रुत बदलते पाएंगे...
इसलिए अरमानों के स्वेटर भी हमने बुन लिए|
कह दिए कुछ सुन लिए
कुछ ख्वाब यूँ ही चुन लिए..."
-मयंक

तन्हाई


"एक उमर ये तनहा गुज़री है 

आदत तन्हाई हो ली है,
बस कल को आग लगा लूं यूँ 
ना हाथ जले ना राख बचे।"

आज रोने को मन किया


"आज रोने को मन किया..
कल पलकें भी भीगेंगी
धुल जाएंगी यादें
तमन्ना कुछ पल को तो चीखेगी...
खोने का ग़म रहेगा ये कब तक..
साँसों का सिलसिला शायद है जब तक..
जागती रातों में..
तेरी बाहों में..
बीती रातों सी मुलाक़ात का मन किया..
बुला लिया..ख्वाबों में तुम्हे..
आज सोने को मन किया|
आज रोने को मन किया.."
-मयंक

तुझे पा के


कल शब नमी थीं आँखों में,
अब शबनमी सी हैं आँखें।
कल सब धुआँ-धुआँ सा था,
और अब सुलग रही सांसें।
कुछ ख़्वाबों के अंगारे
रह-रह सुलग रहे थे तब,
भड़की है दिल में ज्वाला
अबके बरस तुझे पा के।
-मयंक

Sunday, December 9, 2012

एक सच

"बादलों की रेत पर बनती-बिखरती ये लहर...
ग़म में डूबी रात कल थी अब ख़ुशी की है सहर,
कुछ धुवां जलते-सुलगते दिल से कल छँट-सा गया..
सबने जाना दिन हुआ पर जाना ना शब का कहर।"

तेरी रौशनी

"तेरी परछाई इतनी स्याह-सी है गहरी है
कि तेरी ज़ुल्फ़ की बदली में रात उतरी है
है चकाचौंध भी ये आसमां तेरे दम से
है तेरी रौशनी जो चाँदनी में चमकी है।"

वो चला...

"वो जब चला, कुछ यूँ चला, चलता चला, वो मनचला।
अपनी ख़ुशी, अपनी हँसी, जाना यही, बस हर जगह।
रुक के कभी सुस्ता लिया, इस दिल को भी बहला लिया,
जिस से मिला खुल के मिला, सीने से खुद के लगा लिया।
जितनी ख़ुशी लेके चला, वो साथ ग़म देता चला....
वो जब चला, कुछ यूँ चला, चलता चला, वो मनचला।"

एक शहर


"एक शहर वो अजनबी-सा, एक शहर मेरा पता,
एक शहर में पाया खुद को, हो के खुद से लापता।"

खुद से जुदा

***जब मैं खुद से जुदा हुआ था
तू ही मेरा ख़ुदा हुआ था,
हाथ कभी फैलाए थे लब  पे
तू ही मेरी दुवा हुआ था।
जब मैं खुद से जुदा हुआ था***

Saturday, December 8, 2012

तिनका

"गुस्ताख़ तिनका है या... है हवा बदगुमाँ-सी,
वो आई और ये उड़ चला बिन दुवा बिन सलामी।"