Sunday, December 9, 2012

एक सच

"बादलों की रेत पर बनती-बिखरती ये लहर...
ग़म में डूबी रात कल थी अब ख़ुशी की है सहर,
कुछ धुवां जलते-सुलगते दिल से कल छँट-सा गया..
सबने जाना दिन हुआ पर जाना ना शब का कहर।"

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