परिंदे की फ़ितरत थी ज़ख़्मों को लेना
परिंदे की किस्मत थी हर घाव सहना
वो हर बार हर चोट खा के था आता
मैं हर बार बगिया में उसको था पता
मैं मरहम लगाता फिर उसको सहलाता
वो कुछ दिन ठहर के फुर्र से उड़ जाता।
कल शाम भी आया था ज़ख़्मी होके..
बोला मिले उम्रभर मुझको धोखे..
फिर सो गया अपने गम में वो खो के..
फिर सो गया अपने गम में वो खो के।
सुबह जो जागा तो मैने ना पाया उसे वो तो फिर से कहीं उड़ चला था,
शायद दिखा होगा सपना नया सा..
गया था वो धुंधली सी आँखों से रो के..
मिले जो तुम्हे तो उड़ाना नही
खुशियाँ जहाँ की उसे सौंप देना..
परिंदे की फ़ितरत थी ज़ख़्मों को लेना
परिंदे की किस्मत थी हर घाव सहना।
















