अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये,
ख़ुद अपने हाथों से छीनीं थी खुशियाँ
ख़ुद अपने हाथों से आँसू थे बोए।
अश्क़ों से पलकें सजा के सोये,
हम तेरी यादें भुला के रोये।
कलम ने मेरी जब कभी कुछ लिखा तो...
मिसरों में मेरे तेरा ज़िक्र निकला।
चाहा तुझे दिल ने आशिक़-सा होके..
दिल ये बोहोत साला बेफ़िक्र निकला।
सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल लगा के नतीजा क्या निकला??
सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल जला के नतीजा क्या निकला??
ग़म को बहाते गए आँसुवों में,
महफ़िल में सब को रुला के रोये...
अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये।

























