Wednesday, December 18, 2013

अश्क़ों से पलकें

अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये,
ख़ुद अपने हाथों से छीनीं थी खुशियाँ
ख़ुद अपने हाथों से आँसू थे बोए।

अश्क़ों से पलकें सजा के सोये,
हम तेरी यादें भुला के रोये।

कलम ने मेरी जब कभी कुछ लिखा तो...
मिसरों में मेरे तेरा ज़िक्र निकला।
चाहा तुझे दिल ने आशिक़-सा होके..
दिल ये बोहोत साला बेफ़िक्र निकला। 
सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल लगा के नतीजा क्या निकला??

सरे आम कर दी नुमाइश ज़ख़म की,
बता दिल जला के नतीजा क्या निकला??

ग़म को बहाते गए आँसुवों में,
महफ़िल में सब को रुला के रोये...
अश्क़ों से पलकें सजा के सोये...
हम तेरी यादें भुला के रोये।

Saturday, December 7, 2013

यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी

यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई
बचपन के गलियारे जैसे खेले थे हम चोर-सिपाही।
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई...

हाथों से आँखों को ढकना, उलटे दस तक गिनती गिनना,
मैं ढूँढुंगा पहले तुमको, देर तलक पर तुम ना छिपना।
पीपल, बरगद, गुलमोहर से सावन के वो मौसम लाई....
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।

पिछले चंद महीनों से यादों का आना हुआ नहीं तो
यूँ ही इक दिन यादों के आँगन में मन भी पोहोंच गया।
यादों को ढूँढा हमने यादों का पीछा बोहोत किया,
नाम-पता भी खोजा तेरा, हमने कितना जतन किया।
कोई मिला नहीं हमको जो तेरा निशां दिखा जाता
होके तुम अनजान से कैसे मन में आये बतलाता।
बचपन के वो खेले सारे, रेले-पेले-मेले सारे
उन सब मैं तुम साथ थी मेरे, पर तेरी पहचान नहीं,
यादें हैं, यादों में तुम, हो कौन मगर ये पता नहीं।

कैसी उलझन दे डाली ये तूने मुझको हरजाई???
यूँ ही इक दिन याद तुम्हारी मन के आँगन खेलने आई।

Wednesday, December 4, 2013

मैं एक वक़्त का क़तरा था

मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया,
पल भर को हंसाया ख़ूब मगर....जो बीता तो सब रीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।
शिक़वों का कोई हिसाब नहीं दुनिया ने शिक़ायत कहीं बोहोत,
किस-किस को मनाता किस को नहीं लाचार था मैं मजबूर बोहोत।
मैं हालातों की कठपुतली, कठपुतली मैं जज़्बातों की,
जीते-जी हारा खेल बोहोत, जाँ हारा तो सब जीत गया।
मैं एक वक़्त का क़तरा था, पल भर को रुका और बीत गया।

Wednesday, November 27, 2013

बता ज़रा



सज़ा.. मिली…मुझे.. बता.. 
तुझसे किस बात की ??
क़दर भी ना ज़रा-सी की 
मेरे जज़्बात की!!

सज़ा.. मिली…मुझे.. बता.. 
तुझसे किस बात की ??

मेरा होना, या न होना
एक जैसा हसना रोना
मेरे लिए तू ही सब था,
तुझको खोना सबको खोना।

ख़िज़ा मिली बहार से
मुझे सौगात-सी!!
क़दर भी ना ज़रा-सी की
मेरे जज़्बात की!!
सज़ा.. मिली…मुझे.. बता..
तुझसे किस बात की ??

पत्थरों-सा तो नहीं था दिल तेरा
ये था पता,
साहिलों की रेत थी और नाम मेरा
था लिखा।
तेरे जज़बातों कि लहरों में समंदर का जुनूँ
बस यही डर था कि इक दिन लूटेगा मेरा सुकूँ।
बस यही डर था कि इक दिन लूटेगा मेरा सुकूँ..

ख़फ़ा हुई यूँ ज़िन्दगी
मुझसे बिन बात ही...
क़दर भी ना ज़रा-सी की
मेरे जज़्बात की!!
सज़ा.. मिली…मुझे.. बता..
तुझसे किस बात की ??
क़दर भी ना ज़रा-सी की 
मेरे जज़्बात की!!

Wednesday, October 30, 2013

जिन्हे गिनते थे अपने यारों में



दाग़दारों के कूचे-गलियारों में
फ़रेबी की ज़िंदा मिसालों में,
कुछ लोग ऐसे भी थे संग मेरे
जिन्हे गिनते थे अपने यारों में।

बाज़ी हर खेली थी हमने जाँ पे जहाँ
बदले हर पैंतरे धोखेबाज़ों ने…
कुछ लोग ऐसे भी थे संग मेरे
जिन्हे गिनते थे अपने यारों में।

ये किस्मतों कि ही बातें हैं
दोस्त किसको पसंद ऐसे आते हैं?
हमने भी चाहा नहीं कुछ मगर
लिख दी तक़दीर उन ठेकेदारों ने।

…कुछ लोग ऐसे भी थे संग मेरे
जिन्हे गिनते थे अपने यारों में।
-मयंक 

Thursday, October 17, 2013

बेतहाशा



तुमको खोने के महज़ एहसास भर से डरते थे.…
तुमको खोने के महज़ एहसास भर से डरते थे,
यार तुमको प्यार तब हम बेतहाशा करते थे...

यार तुमको प्यार तब हम बेतहाशा करते थे। 


क्या कभी बन पाऊँगा क़ाबिल मैं मेरे यार के?
पूरे भी कर पाऊँगा वादे सभी इस प्यार के??
क्या कभी अपने ये अरमां भी हक़ीक़त पायेंगे?
क्या जुदा होके दोबारा हम कभी मिल पाएंगे??

क्या जुदा होके दोबारा हम कभी मिल पाएंगे??

इन सवालों के जवाबों को तलाशा करते थे...
इन सवालों के जवाबों को तलाशा करते थे,
यार तुमको प्यार तब हम बेतहाशा करते थे|

ये कमी इस दिल को इक दिन तो ख़लेगी था पता,
रात की तन्हाई नागिन है डसेगी था पता.…
दर्द आँखों से पीयेंगे कैसे ये सोचा ना था,
यार तेरे बिन जियेंगे कैसे ये सोचा ना था...

यार तेरे बिन जियेंगे कैसे ये सोचा ना था|

तेरे हर अंदाज़ को खुद में तलाशा करते थे,
तेरे हर अंदाज़ को खुद में तलाशा करते थे.…

यार तुमको प्यार तब हम बेतहाशा करते थे।

तुमको खोने के महज़ एहसास भर से डरते थे
यार तुमको प्यार तब हम बेतहाशा करते थे...
बेतहाशा करते थे.…

Monday, October 7, 2013

वो जो जज़्बात छुपा लेते हैं दिल में अक्सर



 वो जो जज़्बात छुपा लेते हैं दिल में अक्सर
बस वही अर्ज़ यूँ कर जाते हैं हम भी अक्सर,
भरी महफ़िल में तालियों का शोर होता है.…
हम जो पी के भी लय में गा लिया करते अक्सर
हम जो पी के भी लय में गा लिया करते अक्सर।

जो वो जज़्बात छुपा लेते हैं दिल में अक्सर
बस वही अर्ज़ यूँ कर जाते हैं हम भी अक्सर।

 बड़े ताज्जुब से लोग हम से पूछा करते हैं
ये करिश्मा बताओ कैसे किया करते हो??
मौज में लड़खड़ाते क़दमों से तुम आते हो
सुर और ताल में बताओ कैसे गाते हो??
सुर और ताल में बताओ कैसे गाते हो??

कैसे समझाएं अब ये बात के वो तुम ही हो,
थाम लेती हो ख़यालों में जो आ के अक्सर,
वर्ना हमें बिन पिए भी होश कहाँ रहता है
बड़े मदहोश से रहते हैं मेरे दिन अक्सर
बड़े मदहोश से रहते हैं मेरे दिन अक्सर।

जो वो जज़्बात छुपा लेते हैं दिल में अक्सर
बस वही अर्ज़ यूँ कर जाते हैं हम भी अक्सर।

Saturday, September 21, 2013

इस शहर की बात बड़ी है


फुर्सत भी है फुर्सत में तो जल्दी को भी क्या पड़ी है
ये छोटे शहर की बात है, इस शहर की बात बड़ी है।
सुबह की ठंडी पुरवा में मिट्टी की भीनी ख़ुशबू
मंदिर में बजती घंटियाँ, हर ओर अज़ान का जादू...
हर शख्स यहाँ पहचानता है, हर शख्स को अपना मानता है
बातों में तू-तू-मैं-मैं है, नियत पर साफ़ बड़ी है... 
ये छोटे शहर की बात है, इस शहर की बात बड़ी है।
ये सच हमने तब जाना जब वो शहर हमारा छुट गया,
मासूम-सा वो इक बच्चा था, हम लौटे तो वो रूठ गया...
क्या कह के उसे मनाते हम? टॉफी दी..फिर भी ना माना,
हमको ये समझते देर लगी कर चूका वो हमको बेग़ाना..
हमको ये समझते देर लगी कर चूका वो हमको बेग़ाना।
वो फिर हमको अपनाएगा, इस दिल को आस बड़ी है
ये छोटे शहर की बात है, इस शहर की बात बड़ी है।

Wednesday, September 4, 2013

Dekhi Humne Yaar Ye Duniya


देखी हमने यार ये दुनिया...
नफ़रत की तक़रार की दुनिया,
सब कहते हैं जन्नत जिसको,
बे-मतलब बेकार की दुनिया।
देखी हमने यार ये दुनिया...
नफ़रत की तक़रार की दुनिया।

एक लहर सौ कहर समेटे
गुमसुम सी चुपचाप सी दुनिया,
इक पल में घनघोर तबाही
बेदर्दी जल्लाद सी दुनिया।

देखी हमने यार ये दुनिया...
नफ़रत की तक़रार की दुनिया,
सब कहते हैं जन्नत जिसको,
बे-मतलब बेकार की दुनिया।

Wednesday, August 28, 2013

Gunah Kiya

"गुनाह किया... मुहब्बत की
गुनाह किया... वफ़ाएं की
दर क़दम दर साथ चलके
मोड़ आया... भुला दिया..
गुनाह किया...."

Thursday, August 22, 2013

कुछ पल


ज़िन्दगी की कुछ सब से बेहतरीन बातें बस कुछ पलों के लिए होती हैं।
कुछ पल के लिए नज़रों का मिलना...
कुछ पल के लिए साँसों का थमना...
कुछ पल के लिए धड़कन का बढ़ना..
कुछ पल के लिए दिल का बहकना..
कुछ पल के लिए रातों को जगना...
कुछ पल के लिए मैं तेरा सपना...
कुछ पल के लिए तू मेरा सब-कुछ..
कुछ पल के लिए मैं तेरा अपना...
कुछ पल में ही तो है सब कुछ...
कुछ पल तू है, कुछ पल मैं हूँ..
कुछ पल की दूरी होती है..
कुछ पल मजबूरी होती है..
कुछ पल होती है तन्हाई..
कुछ पल को ये भी ज़रूरी है।
बातें सारी ये कुछ पल की, कुछ पल में ख़त्म कहाँ होंगी,
जीने को जीते हैं बरसों, पर जीते सच में कुछ पल है।

Thursday, June 13, 2013

रागिनी



कुछ अंधेरों के लिए फीकी-फीकी रौशनी
कुछ सितारों के लिए धीमी-धीमी चांदनी
ठीक इस तरह ही काफ़ी होती है मेरे लिए
तेरे दिल की रागिनी..
राग जो धड़कन में है।

कुछ बसेरों के लिए झीनी-झीनी चादरें
कुछ बहारों के लिए भीनी-भीनी बारिशें
ठीक इस तरह ही काफ़ी होती हैं मेरे लिए
तेरे दिल की रागिनी..
राग जो धड़कन में है।

कुछ सदी कड़वी लगी थी, पल को कुछ बेस्वाद सी...
तुम मिली आबाद-सी थी, अब है ये बर्बाद-सी
ज़िन्दगी का ज़ायका सारा-सभी बस तुझमें है
किस तरह तुझको बताऊँ क्या कमी अब मुझ में है।

कुछ नगीनों के लिए तीखी-तीखी सी चमक
चंद सिक्कों के लिए खनखनाती सी खनक
ठीक इस तरह ही काफ़ी होती है मेरे लिए
तेरे दिल की रागिनी..राग जो अब अब मुझमें है।

Friday, June 7, 2013

Alfaaz#3


ये बदलेगा पैंतरे अगली चाल देखिएगा
चुप रहिएगा इश्क़ के कमाल देखिएगा।

हो-हल्ला मचेगा दिलों में भी फिर से
मोहोब्बत की अगली बिसात देखिएगा
चुप रहिएगा इश्क़ के कमाल देखिएगा।
ये बदलेगा पैंतरे अगली चाल देखिएगा...

मुहब्बत की ये दासताँ है पुरानी
मुहब्बत की ही बात है हर ज़ुबानी
मोहोब्बत है तूफां, मोहोब्बत है आँधी
मोहोब्बत में आशिक़ तो होता है बाग़ी।
कभी इक़रार, कभी इनकार, कभी तक़रार देखिएगा...
ये बदलेगा पैंतरे अगली चाल देखिएगा...

चुप रहिएगा इश्क़ के कमाल देखिएगा।

Thursday, May 9, 2013

Jise Duniya Gunah Kehti Hai


जिसे दुनिया गुनाह कहती है, हर बार कर रहा हूँ मैं,
चाहत भी बेवफ़ाई भी
इक साथ कर रहा हूँ मैं।
चाहत भी बेवफ़ाई भी, इक साथ कर रहा हूँ मैं। 

मुझ जैसा काफ़िराना तो सारे जहां में क्या होगा...
पर मैंने वफ़ाएं भी की हैं
थोड़ी जफ़ा से क्या होगा??
मैंने वफ़ाएं भी की हैं तो थोड़ी जफ़ा से क्या होगा!
मेरे गुनाह माफ़ हों
दरखास्त कर रहा हूँ मैं,
जिसे दुनिया गुनाह कहती है, हर बार कर रहा हूँ मैं।

जिसको भी देखा शहर में, उलझा हुआ ही पाया...
दिल को जला के ढूँढता 
अपने ही दिल का साया।
दिल को जला के ढूँढता, अपने ही दिल का साया।
हम तो अलग थे भीड़ से, इन सब से थे जुदा-जुदा
ताल्लुक शहर से जो हुआ,
हम खुद भी भीड़ बन गए। 
ताल्लुक शहर से जो हुआ, हम खुद भी भीड़ बन गए
जिसे दुनिया सुकून कहती है, ठोकर में दे रहा हूँ मैं,
पल-पल में मर के ज़िन्दगी 
हर मौत जी रहा हूँ मैं।
जिसे दुनिया गुनाह कहती है, हर बार कर रहा हूँ मैं।

Thursday, May 2, 2013

Aik Sawaali


बहुत दिनों से जाग रहा था एक सवाली सरहद पे
ठंडी मिट्टी ताप रहा था एक सवाली सरहद पे,

मेरी बीवी, मेरे बच्चे, मेरा चौखट तन्हा होंगे
सूने रस्ते कच्चे-पक्के तकते मेरा रास्ता होंगे,
मेरे सपने, मेरे अपने, मुल्क भी मेरा रुसवा होंगे
एक बार मिलने ना आया, ऐसा करते शिकवा होंगे..
एक बार मिलने ना आया, ऐसा करते शिकवा होंगे

बहुत दिनों से मांग रहा था भीख रिहाई सरहद पे
ठंडी मिट्टी ताप रहा था एक सवाली सरहद पे। 

पिछले मास जो लोहड़ी बीती, क्या बतलाऊँ कैसी बीती
मुझको मेरे घर जाना है, मैंने बड़ी गुज़ारिश की थी।
गाँव में मेरे खेत है छोटा, उसकी फसल पकी तो होगी
मुट्ठी भर गुड़ चना रेवड़ी मेरे घर भी बँटी तो होगी।
तू बतलाये ना बतलाये मुझको पता है सब सुखप्रीतो
पिछले २२ साल की रातें तेरी रो-रो कटी तो होंगी... 
पिछले २२ साल की रातें तेरी रो-रो कटी तो होंगी।

यादों में वो झाँक रहा था एक सवाली सरहद पे
अपनी चिट्ठी बाँच रहा था एक सवाली सरहद पे। 
बहुत दिनों से जाग  था एक सवाली सरहद पे...

Tuesday, April 30, 2013

अलफ़ाज़-2


"तितलियों के रंग हैं..जितने सारे संग हैं..तेरे ख़्वाबों के
खुशबुवें हैं बाग़ों में..छू हवा चली है जो तेरे.. बालों से,
ये सारे रूप-रंग खूबसूरती-उमंग..सब हैं घबराये हैरान से
के जबसे तुम हो आई..दुनिया इनको भूली हाय
नाम लेते हैं सभी तेरा मिसालों में...
नाम लेते हैं सभी तेरा मिसालों में।"

Monday, April 29, 2013

तेरी हसरतें


थी तेरी निगाहों से आज़ादी चाही
मैं फिर से पनाहें तेरी चाहता हूँ,
बसा दिल में या फिर मुझे आ के कस ले
मैं फिर से तेरी हसरतें चाहता हूँ।
मैं फिर से पनाहें तेरी चाहता हूँ
हाँ, फिर से पनाहें तेरी चाहता हूँ।

ना ही उम्र से, रूप से, रंग से
चहरे-मोहरे बदलने से भी कम ना होगा
इबादत सा है तुझसे ये प्यार मेरा..
मैं करता रहूँगा, ये बढ़ता रहेगा।

मैं बिछड़ा जो तुझसे भुला डाला सब कुछ
हाँ फिर भी सदाएं तेरी मैं ना भूला,
एक दीवानी मेरी पगली
तेरा पागलपन ना भूला।

कभी गूँजतीं हैं ये कानों में मेरे
ख़ामोश सी बैठ जाती हैं अक्सर,
कभी रूठती हैं, कभी मानती हैं
तेरे बाद अब तो तेरी याद ही हैं।
तेरे बाद अब तो तेरी याद ही हैं...

थी अपने गुनाहों से मांगी रिहाई
मैं फिर से सजाएं वही चाहता हूँ,
बसा दिल में या फिर मुझे आ के कस ले
मैं फिर से तेरी हसरतें चाहता हूँ...
हाँ, फिर से पनाहें तेरी चाहता हूँ।

Friday, April 19, 2013

जीवन जीने को तरस गए


जीवन जीने को तरस गए, आँखों से सपने बरस गए
तुम थे अपने सब थे अपने, तुम क्या बदले सब बदल गए
जीवन जीने को तरस गए, आँखों से सपने बरस गए।

उभरे सपने आँखों से वो पलकों को यूँ छू कर निकले
उस इक छोटे से लम्हे में मेरे बीते सारे कल निकले,

हर कल में यादें हर पल की, हर पल में बातें इस दिल की
इस दिल में तेरी आवाजें..., उन आवाजों को तरस गए।

जीवन जीने को तरस गए, आँखों से सपने बरस गए...

Monday, April 8, 2013

अल्फ़ाज़ #1



एक सदी से ज्यादा लम्बा 
एक घड़ी से कम वो लम्हा,
एक शहर यादों का तेरी 
बसा-बसाया तबाह हुआ। 

कहने को कह डाली हमने
जो ना बात बतानी थी,
एक वो दिल में छुपी रह गई
बात जो कहने वाली थी,

सुर्ख़ लहू के जैसा गहरा
कभी हुआ पानी जैसा,
जिस से जा के मिला कभी तो
घुला वो क़तरा वही हुआ। 

Friday, March 29, 2013

ऐ दिल


जाने कैसे ये रिश्ते तुझको पसंद आते हैं दिल
वो जो होते हैं अपने अजनबी बन जाते हैं दिल,
उनकी बातों पे आज भी भरोसा है तुझको 
बात करके जो हर बार मुकर जाते हैं दिल...

जाने कैसे ये रिश्ते तुझको पसंद आते हैं दिल।

मुझको अब तक यकीं नहीं ये हो रहा ख़ुद पे
के उनको फिर भी मैंने सीने में बसाया है,
वो जो मरहम हैं देते फिर से ज़ख्म देने को...
दिल में रह कर ही क़त्ल-ए-आम जो कर जाते हैं दिल। 

जाने कैसे ये रिश्ते तुझको पसंद आते हैं दिल।

Thursday, March 21, 2013

ये मैं हूँ।


भला भी हूँ मैं..बुरा भी हूँ
मिला-मिला सा...जुदा भी हूँ,
कुछ रंग में तेरे मैं...हूँ रंगा हुआ सा..
गुमनाम गलियों से..बदरंग भी हूँ।

भला भी हूँ मैं, बुरा भी हूँ
मिला-मिला सा, जुदा भी हूँ
 
नाज़ुक-सा दिल खुरदुरा भी है...
अपनों का मगर रहनुमा भी है,
रिश्ते पाए इसे गुमाँ भी है
फिर भी कोना कोई सूना भी है,
नादान हूँ मैं, सरफिरा भी हूँ,
दुनियाँ की नज़र में...हाँ, गिरा भी हूँ।
 
भला भी हूँ मैं, बुरा भी हूँ
मिला-मिला सा, जुदा भी हूँ
 
कुछ रंग में तेरे मैं हूँ रंगा हुआ सा,
गुमनाम गलियों से बदरंग भी हूँ।
भला भी हूँ मैं, बुरा भी हूँ
मिला-मिला सा, जुदा भी हूँ।

-मयंक 

Tuesday, March 19, 2013

भुला दी

कहना था तुमसे...दिल का राज़,
कहती जो आहें..मेरे सारे जज़्बात।
हम मिले तुमसे..हुई शुरुवात
महके से दिन थे.. बहकी-बहकी-सी रात,
होना था क्या इस से हम बे-ख़बर
इश्क़ है कितना बेसबर
था तेरा ही ये असर था...... 
भुला दी.. तेरी हर सदा भी,
हाँ जिसपे फ़िदा थी... मेरी ज़िन्दगी,
भुला दी, तेरी हर सदा भी...
हाँ जिसपे फ़िदा थी...मेरी ज़िन्दगी...

मेरी हर ख़ुशी!!

ग़म हमें भी है...जो भी हुआ
तुझपे यकीं था..तू बे-वफ़ा हुआ,
सख्त है दिल भी उसके बाद...
चाहा ना फिर यूँ 
चाहा तुझे जिस तरह...
होना था क्या इस से हम बे-ख़बर..
इश्क़ है कितना बेसबर..
था तेरा ही ये असर था... 
भुला दी...तेरी हर सदा भी,
हाँ जिसपे फ़िदा थी...मेरी ज़िन्दगी,
मेरी हर ख़ुशी!!

-मयंक

Saturday, March 16, 2013

जुदाई



होनी थी गर जुदाई.. मजबूरियों से होती,
इस बात की ज़रा सी हमको ख़बर तो होती..

ग़म हमको तब ना होता, तुम इस तरह ना रोती
तन्हा  फ़लक के तारे आँखों में भर ना सोती,
होनी थी गर जुदाई.. मजबूरियों से होती।

ताज्जुब हमें ये है बस इक हम ही बे-ख़बर थे
वर्ना ये बात अब तक सबको पता ना होती।
होनी थी गर जुदाई.. मजबूरियों से होती,
इस बात की ज़रा सी हमको ख़बर तो होती।
-Mayank 

Friday, March 15, 2013

सवाल



अब ना है कोई तीर भी ना ही कोई कमान है

जाने क्यूँ हर निगाह में फिर भी कई सवाल हैं?

रंजिश थे जो निभा चले उनको गले लगा लिया
दुश्मन के मन को जीत कर अपना उन्हें बना लिया,
अब ना है कोई जीत में ना ही किसी की हार है
किस हक़ में होगा फ़ैसला फिर भी ये इंतज़ार है।

अब ना है कोई तीर भी ना ही कोई कमान है
जाने क्यूँ हर निगाह में फिर भी कई सवाल हैं?
-Mayank

Thursday, March 14, 2013

तेरी याद में


रात भर तेरी याद में हम सहर देखते रहे
बेसब्र इंतज़ार की इन्तहा देखते रहे।

रात भर तेरी याद में हम सहर देखते रहे...

पीली सरसों की बालियाँ, गोरे गालों की लालियाँ
और इस जवाँ-सी रात को रात भर देखते रहे।

रात भर तेरी याद में हम सहर देखते रहे...

तुम को तो ये खबर नहीं तुम को कहाँ बसाया है
दुनिया की सारी नज़रों से हमने तुम्हे छुपाया है।

इक तेरे'ही दीदार में हमसफर देखते रहे 
रात भर तेरी याद में हम सहर देखते रहे।
-Mayank Thapliyal

Wednesday, March 13, 2013

एहसास


वो रौशनी का क़तरा है या अँधेरे पे दाग़ है
जलती है, ठण्ड देती है, जाने ये कैसी आग है।
है कौन साया बनके जो रहनुमा मेरे साथ है
दिखता नहीं है वो ख़ुदा होता जो आस-पास है।

Sunday, January 13, 2013

दिल कहीं छुपता रहे

दिल कहीं छुपता रहे...
अपनो से रुसवा रहे..
हो ज़हन में ज़ख्म भी तो अश्क़ से सीता रहे...
दिल कहीं छुपता रहे...
अपनो से रुसवा रहे..
ग़म तो सबको है यहाँ..
ये काफ़िला ग़मगीन है,
क्यूँ कहूँ फिर आँख का आँसू बड़ा नमकीन है??
बस यही गुनता रहे..
अपनी ही सुनता रहे...
दिल कहीं छुपता रहे...
अपनो से रुसवा रहे..
-मयंक

Sunday, January 6, 2013

ज़रा-सा


"ज़रा-सा लिखा और बोहोत कुछ मिटाया..
आलम यूँ दिल का बख़ूबी बताया..
छुपाईं बोहोत सारी बातें भी तुमसे...
मगर प्यार दिल का कभी न छुपाया।..
ज़रा-सा लिखा और बोहोत कुछ मिटाया..
आलम यूँ दिल का बख़ूबी बताया..
वो झगड़े की जिन में उलझ सा गया प्यार अपना जो लगता था सुलझा कभी...
वो शक की तपिश में झुलस सा गया मन का विशवास मुझपे था तुझको कभी...
मैं खोने की हसरत से तुझसे मिला था..
तो खो के भी मैंने बोहोत कुछ था पाया...
ज़रा-सा लिखा और बोहोत कुछ मिटाया..
आलम यूँ दिल का बख़ूबी  बताया.."
-मयंक

Saturday, January 5, 2013

ज़िन्दगी बन कर


"उसके चेहरे पे ख़ुशी देखी तब ये जाना के
मैं भी जिंदा हूँ अब किसी की ज़िन्दगी बन कर।"
-मयंक